आतंकवाद की चिता जलाई जो तुमने,
आँसू के घर में आग लगाईं जो तुमने ||
हर माँ का ह्रदय बिलखता है,
मासूमों पर गोलियां चलाई जो तुमने ||
तुम निर्दय हो, हत्यारे हो, संघारक हो मानवता के,
यह धर्म नहीं है, दीन नहीं, ईमान नहीं |
यह पशुता है, कायरता है, ऐसा करता बलवान नहीं,
बच्चों की तुम हत्या कर दो, ऐसा कहती कुरान नहीं ||
तुम खून बहाओ बच्चों का, इसको कहते जेहाद नहीं,
क्या खुदा, माँ की पीड़ा का, सुनता कोई फरियाद नहीं |
सच की बुनियादों पर, कायम है ये दुनिया सारी,
तुम रौंद नहीं सकते इसको, कर सकते हो बरबाद नहीं ||
जिन बच्चों को मारा तुमने, वे बच्चे माँ के बेटे थे,
उस माँ का दूध लजाता है, उस माँ का ह्रदय सिसकता है |
तुमने जो कृत किया पापी, उससे वह दूध लजाता है,
जो हर माता के आँचल में, करूणा की धार बहाता है ||
सावन आया (गीत)
ग्रीष्म-ताप सिमट गया पावस का मजा लीजिये
मस्ती भरी फुहार की बहार लुटा दीजिये
श्वेत श्याम रतनार कजरारे मेघों को
बहती पुरवाई के झूलों में झुला दीजिये
परदेस बसी बहनों को मयका याद आ रहा भाइयों से मिलने सावन में बुला लीजिये
बागन में झूले पड़े झूलती किशोरियों के कजरी के सरस बोल मन में बसा लीजिए
चौपालों में ढोलक और ढपली की खनक पर आल्हा मेघमल्हार की धमाल मचा दीजिये
रसिया गाते घूम रहीं रसिकों की टोलियाँ रिमझिम बरसात में तन-मन घुला दीजिये
रक्षा-बन्धन पर बहनों से राखी बंधाइये फिर प्रीति-पगे त्योहारों का सावन विदा कीजिये
परदेस बसी बहनों को मयका याद आ रहा भाइयों से मिलने सावन में बुला लीजिये
बागन में झूले पड़े झूलती किशोरियों के कजरी के सरस बोल मन में बसा लीजिए
चौपालों में ढोलक और ढपली की खनक पर आल्हा मेघमल्हार की धमाल मचा दीजिये
रसिया गाते घूम रहीं रसिकों की टोलियाँ रिमझिम बरसात में तन-मन घुला दीजिये
रक्षा-बन्धन पर बहनों से राखी बंधाइये फिर प्रीति-पगे त्योहारों का सावन विदा कीजिये
आओ हिल-मिल कर हम गायें, गीत,
आओ हिल-मिल कर हम गायें,
अपने सपनों को दुलरायें |
चिड़ियाँ चीं-चीं बोल रही है,
बंद पंख अब खोल रही है ||
मन-उपवन में हुआ जागरण,
शांत-सुमीरण डोल रही है |
सोये हैं जो लोग अभी तक,
आओ पहले उन्हें जगायें ||
कलियों में निखार तो देखो,
यह सोलह सिंगार तो देखो |
सबके दिल में वही धड़कता,
ह्रदय-ह्रदय में प्यार तो देखो ||
धार-बह रही रूप-सुधा की,
आओ हम भी प्यास बुझायें |
सबके मन में प्रीत जगाओ,
कोई ऐसा गीत सुनाओ ||
तार-तार बज उठे ह्रदय के,
वह प्यारा संगीत सुनाओ |
स्वागत में स्वर्णिम प्रभात के,
राह-राह पर फूल बिछायें ||
आओ हिल-मिल कर हम गायें,
अपने सपनों को दुलरायें |
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ (गीत)
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
अंधियारे में फूल खिलाऊँ |
मानवता का ह्रास हो रहा,
दानवता नर्तन करती है ||
अत्याचार बढ़ गये इतने,
पशुता अट्टहास करती है |
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
हँसी-ख़ुशी के फूल खिलाऊँ ||
कोई नहीं किसी की सुनता,
भाई क्यों भाई से लड़ता |
बम-बंदूकों के साये में,
अब तो सबका जीवन पलता ||
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
धरती से आतंक मिटाऊँ ||
माँ की ममता यहाँ बिलखती,
आँसू से है आँचल भरती |
अपने बच्चों की ठुकराई,
कदम-कदम पर ठोकर सहती ||
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
मैं ममता को गले लगाऊँ ||
सारा भेद मिटाना होगा,
सबको एक बनाना होगा |
नरक बन गये इस जीवन में,
स्वर्ग कहीं से लाना होगा ||
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
मैं करूणा की धार बहाऊँ ||
यहाँ शान्ति के पाठ पढ़ाने,
मत क्रंदन के गीत सुनाओ |
बंधन-बांधों प्रीति प्यार के,
अपना पन सबको सिखलाओ ||
तेरी कृपा अगर पा जाऊँ,
मैं काबा-काशी बन जाऊँ ||
उत्तर-पूर्वी यात्रा ( गीत )
हम दोनों ननद-भावज, करने सैर चले |
वायुयान से बचे समय, गाड़ी देर चले ||
चैतन्य प्रभु की बनी समाधी, मायापुरी में देखी है |
जन्मस्थली रही नवद्वीप, जिस तट गंगा बहती है ||
शिवशंकर का विशाल मंदिर ताड़केश्वर में है बना |
शिवगंगा में डुबकी लगाके, हर्ष हुआ है बहुत घना ||
दार्जिलिंग जा पहुँचे हम तो, करने सैर सपाटा |
छुक-छुक गाड़ी से उतरे हम, प्लेट फार्म को टाटा ||
प्रकृति-नटी की शान अनोखी, विस्तृत चाय-बागानों में |
दृश्य अलौकिक सूर्योदय का, ओस चमकती धानों में ||
अब जा पहुँचे टाइगर हिल हम, सूर्योदय का दृश्य देखने |
उषा की मुस्कान सुनहरी, अरुणोदय के पल लखने ||
स्वर्णिम हिम-आवृत शिखर |
गंगटोक दार्जिलिंग की राहों में फैली छटा निखर ||
तीस्ता और रंगीत का संगम, बड़ा सुहाना लगता था |
हनुमान मंदिर भी रंग-बिरंगे, फूलों से सजता था ||
सांगो झील गणेश मंदिर, फूलों के उत्सव अदभुत थे |
दृश्य अलौकिक देखा सोचा, यह सपना या सचमुच थे ||
मौज मनाने धूम मचाने, नेशनल पार्क में जा पहुँचे |
नाम था काजीरंगा जू, गेंडे मोटे हाथी बड़े-बड़े देखे ||
तेजस्वनी उषा ने देखा, कभी एक शुभ-सपना |
सहयोग चित्रलेखा का पा, अनिरुद्ध बनाया अपना ||
सपन सुहाना था वो जिसमें, आया सुन्दर राजकुमार |
जिसे देख उषा रानी के, थिरक उठे थे मन के तार ||
घोर गर्जना मेघों की जो, मेघालय नाम सार्थक होगा |
खूब झमाझम बादल बरसें, उसका मजा अलग होगा ||
प्यारी-प्यारी बालाएँ वो, गुड़िया जैसी दिखती थी |
शिलांग के बाजारों में तो, जापानी चीजें बिकती थी ||
चेरापूंजी में होती है, सबसे ज्यादा बरसात |
हरे-भरे हैं बाग़-बगीचे, शीतल दिन वो ठंडी रात ||
कामख्या देवी के पूजन को, जा पहुँचे गुवाहाटी |
ठंडा-मीठा शर्बत पीये, खाए दाल वो बाटी ||
कलकत्ता की काली माता, तेरे दर्शन को आये |
पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट चढाने लाये ||
मशहूर वहां का घाघरा चून्नी, और मिले सिंदूर |
खाने को रसगुल्ले सिंघाड़े, राजकचोरी भी भरपूर ||
दृश्य निराले अदभुत सारे, सब देखे फिर लौट चले |
वायुयान से पहुंचे झटपट, गाड़ी से लगती देर भले ||
सारे अनुपम दृश्य पिरोकर, उस माला को फेर चले |
हम ननद और भावज दोनों की, पूरी सुन्दर सैर अरे !|
संपत देवी मुरारका (भाभी) "संपत"
विजयलक्ष्मी काबरा (ननद)
"कश्मीर से अमरनाथ”
कश्मीरी घाटी का देखो, मनभावन है दृश्य |
ऊँचे-ऊँचे पर्वत नीचे, चिनार देवदार के वृक्ष ||
लिद्दर, सिन्धु, झेलम के तट का, सुन्दर बड़ा नजारा |
श्रीनगर की झीलों में तो, सैर का ढंग है न्यारा ||
हजरत बल मस्जिद, परिमहल, चश्म शाही फिर आये |
शीतल जल का चश्म ये देखो, कई तरह के रोग मिटाये ||
निशात, शालिमार बाग़ बगीचे, पुष्प कमल कुमुदिनी के |
सजे हुए थे इन पुष्पों के, सुन्दर मुकुट सारी झीलों के ||
गोल्फों के मैदानों ने तो, गुलमर्ग की शान बढ़ाई |
ढकी बर्फ से पर्वत चोटियाँ, स्कीइंग का बोध कराई ||
गंडोला कार की सैर को, मन से जाता नहीं निकाला |
कोंगडोरी तक ही ले पाई, उस सैर का मजा निराला ||
विश्व में सबसे ऊँचा पर्वत, देखने का मौका न मिल पाया |
14500 फीट ऊँचा पर्वत 'अफरवट', देश की शान बढ़ाया ||
शंकराचार्य का मंदिर देखो, बना यहाँ पर विश्व प्रसिद्ध |
290 सीढ़ियाँ बनी यहाँ की, ऊपर से दिखे विहंगम दृश्य ||
क्षीर भवानी मंदिर, कुण्ड अनंत नागों का |
रावण ने भी करी तपस्या, किया आह्वान माता का ||
जगदम्बा 'श्यामा' बन रही लंका में, पूजा थी राक्षसी तामसी |
क्रोधित हो आ गई भवानी, भारत आ कश्मीर बसी ||
सोनमार्ग सिन्धु की घाटी, नदियों की महारानी |
अभयारण्य की घाटी की शोभा, ना जाए बखानी ||
बालटाल में लगा था मेला, यात्रा करने वालों का |
आकाशमार्ग या पैदल चलते, बाबा के मतवालों का ||
अमर गंगा में स्नान किया, फिर हिम पीठ जा पहूँची |
जहाँ विराजे अमरनाथ जी, हिम नहीं वह कच्ची ||
प्राकृतिक गुफा में देखा, अदभुत शिव परिवार सजा सा |.
बूँद-बूँद गिरता जल जमता, वृहदाकार शिवलिंग बनाता ||
बाबा पहलगाँव (बैलगाँव) में, नंदी वर्धा को शीश नवाके |
नील गंगा में मुख धोकर, चन्दन बाडी चन्द्रमा त्यागे ||
पिस्सू घाटी त्रेशांक पर्वत पर, मिटाया असुरों का वर्चस्व |
शेषनाग की महिमा न्यारी, मिटे कष्ट पाप सर्वस्व ||
पंचतरनी में माँ गंगा का, पञ्च तत्त्वों का त्याग किया |
अनंतनाग में बाबा भोले का, भक्तों ने जयकार किया ||
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गुफा में बाबा ने माँ को, अमरकथा से तृप्त किया |
अमरकथा सुन शुकदेव जी ने, भावमग्न अमरत्व पिया ||
छड़ी मुबारक आई देखो, नमन करूँ में बारम्बार |
श्री चरणों में बाबा मेरा, करो शीश नमन स्वीकार ||
बालटाल से श्रीनगर, वापस लौटकर आये |
रात बिताई हाउस बोट में, सुबह को दिल्ली आये ||
करूँ प्रार्थना में ईश्वर से, सभी को शक्ति प्रदान करें |.
प्राकृतिक सौन्दर्य के दर्शन, कर अपना कल्याण करें ||





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